Wednesday, April 15, 2009

meraa kal ... yatraa vritant






आकाश की ऊँचाईयों को छूता हुआ मेरा जहाज एक अंत हीन दिशा की और उड़ता चला जा रहा थाआस पास बैठेज्यादातर सभी अपरिचित लोग या तो ऊँघ रहे थे या टी ।वि । देख रहे थे , 450 सीट वाले जहाज में हर व्यक्ति एकदूसरे से अपरचित अपने ही आप में खोये थे . कुछ वो जो अमरीका वासी थे , कुछ जो आते रहते थे , और कुछ जोपहली बार जा रहे थे , मैं इसी श्रेणी में आती हूँ . ना तो मुझे नींद आ रही थी ना ही मुझे टीवी अपनी उर आकर्षित कररहा था । निहायत उबाऊ और नीरस से वातावरण ने में उकताहट को और बढ़ा दिया था, कैसे कटेगा १४ घंटे का यहसफर सोंच सोंच कर मै अधमरी हुई जा रही थी.हार कर अपनी बगल की सीट पर बैठे एक अमरीकन की नींद मेंखलल दाल ही दिया “भाई साब आप मिनिआपोलिस जा रहे है”उसने मुझे ऐसे देखा मानो कोई बिच्छू देख लिया हो,बड़े ही रोबीले अंदाज़ में अमरीकन अंग्रजी में उसने मुझे झाड़ दिया, “यह भी कोई तरीका है बात करेने का…..हमारी कंट्री में बिना रिक्वेस्ट बिना थान्क्यू कोई बात पुरी नही होती.”घबराहट के मारे मैंने अपने होंठ सिल दिए मै हिन्दुस्तानी राह चलते से बात करेने की आदत जब चाहा किसी को बहनजी किसी को भाई साहिब बना लियाऔर खोद लिया उसके सारे खानदान को, कोई ना कोई रिश्ता किसी के चाचा ताऊ या दादा दादी से तो निकल हीआयेगा।
मन ही मन अपने आप को गरियाया, बिटिया ने बार बार फ़ोन पर बताया था ज्यादा किसी से बात कराने की जरूरत नही है. हार कर आँखों को जबर दस्ती उनके गढो में घुसेड़ा और सोने की कोशिश में लग गई .आँख खुली तोपता चला की वक्त कब का बीत चुका है मनिअपोलिस पहुच गयी हूँ। बिटिया ने यह भी समझा दिया था की ऊपर निशाँ देखती हुई चलना पता चल जायेगा की सामान कहा मिलना है..जहाज से निकली बोर्ड देखा और चल पडी,. निशाँ ऐसे की देखते ही देखते द्रुपदी की चीर की तरह बढ़ते चले जा रहेथे.तीन किलोमीटर कीपैदल यात्रा कराई फिर तीन एस्कीलेटर निचे उतारे फिर दो एस्कीलेटर ऊपर चढाया फिर एकएस्कीलेटर निचे उतारा सामने बिटिया दिखाई दी द्रौपदी की सारी सिमट ही गयी.पूँछ हीलिया “हनी तुम्हारा अमरीका मेरी समझ में नही आया जब तीन एस्कीलेटर निचे उतार हीलिया था तो दो एस्कीलेटर ऊपर चढ़ा करफिर एक एस्कीलेटर उतारने की क्या ज़रूरत थी? हमेशा कीतरह जैसे दांत दिखा कर ज़ोर से हंस पडी हनी औरबोली , “माँ तुम्हारी समझ में नही आयेगा ,घर चलो.” मै इतनी पढी लिखी होकात्र भी एकदम से अनपढ़ हो गई ,समझ में नही आया ग़लती कहा हुई………..खैर कार में बैठ कर घर को चल पडी. सुंदर पहाडी इलाका मनिआपोलिस दूर-दूर तक सिर्फ़ हरियाली बड़े बड़ेपेड़ और झुरमोट से झाकते एक ही जैसे घर, बीच से नागिन कीतरह बलखाते रास्ते , सफाई इतनी की अपना साँवला रंग भीगंदा लगने लग गया था। प्रकृति ने मानो सुन्दरता की पूरी सुराही यही पलट के रख दी हो.कोई पेड़ लाल, कोई पीला,कोईहरा,कोईजामुनी ऐसालगता धरती का ये श्रृंगार बूढे विधि ने बड़ी अत्मियाता से किया है. बड़ी उत्सुकता से मैंने बिटिया से पूछ ही लिया " " बेटा ये रंग " प्रश्न अभी पूरा भी नही हुआ था की उत्तर आ गया “माँ, ये फाल यानी पतझर का मौसम है इसे देखेनेदूर-दूर से लोग आते है बर्फ गिरने से पहले इन वृक्षो को अपने पत्ते गिराने पड़ते है और उसी से पहले येअपने को अलग अलग रंगों में बदलते है.सबसे सुंदर तो वो मेपेला है जो लाल रंग के हो जाते है.” ऐसा लग रहा था मनो येवृश्क्षा ये संदेश दे रहे हो हमें देखो हम मिटने से पहले जियेगे, फिर उगेगे और जाते जाते अपने योवन का उफानसबको दिखा कर जायेगे। घर पहुंचे सुंदर सा घर कांच से छन छन कर आती धुप, पीछे दिखने वाले जंगल और उसी के बीच फैली झीलमनोहारी दृश्य लगा , लगा की प्रक्रति से बातें कराने का मौका ज़रूर मिलेगा. “माँ” अचानक मेरा ध्यान टूटा” चायतैयार हो जाओ हम इंडियन टेम्पल चलते है, आज पापा के श्राद्ध की तिथि है ना अर्चना करेगे.मन हीमन सोंचा की कोने कोने में इंडियन टेम्पल देखने वाले को इंडियन टेम्पल देखने की बात सुननी पड़ रही है. तैयार होकर हमपरदेस में भारतीया संस्कृति का छोटा सा नमूना देखने चल दिए.बीस मील की दूरी पर था इंडियन टेम्पल सुनसानसीजगाह हां…..मन्दिर का द्वार काफी भव्य बन रहा था. बड़े से हाल में छोटे छोटे देवी देवेता अलग अलग मंदिरो मेंविराजमान जिसकी जैसी इच्छा हो वो वैसी पूजा करा ले। सोमवार का दिन था रुद्राभिषेक कराने वालो की भीड़ थी अधिक तर युवा जोड़े जो ज़्यादातर दक्षिण भारत से थे.पास में बैठे जोड़े से बात की” बेटा किस बात की पूजा करा रहे हो”? उत्तर पत्नी ने दिया “वो देस में हमारा फादर अकेला है ना उसी कीलोंगा लाइफ की पूजा देरहे है”।" कहाँ रहते हैवो”?मैंने तडाक से दूसरा प्रश्न गोली की तरह से दाग दिया… इस बार उत्तर पति ने दिया ओल्ड होम में ..मै अवाक पाँच गेलें दूध, त्रापिकानाके जूस और फल से पूजा ओल्ड होम में रहने वाले पिता के लिए की जा राही थी.” तुम उन्हें अपने साथ क्यो नही ले आते “, ना चाहते हुए भी मैंने एक प्रश्न और पूँछ ही लिया. आंटी व्हो हमारे साथ अडजस्ट नही कर पायेगा ना, और बीमार भी बहुत है यहाँ लाना प्राब्लम है.”.वहा कुछ हो जाए तो?” मै तपाक से बोली. फिरसे उत्तर पत्नी का ही आया” देखिये आंटी जाना तो सभी कोही एक दिन, हम सिर्फ़ भगवान से प्रे कर सकता है”. आरती शुरू हो गयी . आरती समाप्त कर हम घर पहुंचे, मन में छटपटाहट भी बहुत थी. रात हो चुकी थी थकान भीबहुत थी पर नींद थी की आने का नाम ही नही ले रही थी. दूसरे दिन नाती को स्कूल छोड़ कर वापस आ रही थी हनी ने कहा “ माँ कुत्तो के लिए टिक कालर बेंड ले लो तो कीडे नही लगेगे.” गाडी दूकान के सामने लगायी दूकान का नाम था पेट्स पार्लर , अन्दर घुसी तो आँखे फटने की सीमाए भी ख़तम हो गयी.कुत्तो का इतना बड़ा ब्यूटी पार्लर मैंने तो कभी नही देखा था.अचानक नज़र पडी तो देखा की मन्दिर में मिलाने वाला दक्षिण भारल का जोड़ा वहा भी मौजूद था, “अरे बेटा आप”मेरानाम शिव स्त्रोत्रम है औरये है मेरी पत्नी सुशीला कल हम आपको अपना परिचय देना भूल ही गए थे".अपने कुत्ते को सजवा रहे थे उसके बालोमें कर्लर लगवा रहे थे.” बेटा बड़ा खर्च आता होगा” उत्तर मेरी बेटी ने दिया “ माँ यहाँ कुत्ता पालना बहुत कठिन है.वोही पाल सकता है जो इसे इंसान की तरह रखे.” “ हां आंटी” शिव बोला “ सही कह रही है.” अपने कुत्तो के लिए सामान लेकर बाहर निकली तो बगल में बोर्ड लगा था पेट्स होटल समझ नही पायी आँखें प्रश्न बन कर बेटी की तरफ घूमी वो मेरा प्रश्न भाप चुकी थीफ़ौरन बोल पडी ये पालतू जानवरों का होटल है , अगर आपको कही बहार जाना है तो आप अपने कुत्ते को यहाँ कमरा बुक करा के रख कर जा सकती है. "होटल; हमारी दिल्ली के पांच सितारा होटल को मात कर रहा था . अपने अन्दर अपना हिनदुस्तान ढूँढ रही थी मौन सा चा गया पैसे से दमदमाती इस दुनिया को देख कर हनी की आवाज़ फिर सुनाई दी " यहाँ लोग कुत्ते को कुत्ता कहने से बुरा मानते है किसी से कह मत दीजियेगा तुम्हारा कुत्ता बड़ा प्यारा है ,कहियेगा तुम्हारा बेबी बड़ा प्यारा है .
दिन कैसे गुज़रे पता ही नही चला , सपनो की रुपहली दुनिया में दिन खो से गए थे गाडी का हार्न कोई सुन नही सकता है खामोशी इतनी की दिल घबराने लगे पक्षियों की बोली सुनाने के लिए कान तरसते और देखने के लिए आँखें थक जाती .ऐसा लगता प्रकृति ने उन्हें भी सीख देदी हो चुप रहने की जिस शीशे लगे दरवाज़े के सामने बैठ कर मैंने प्रकृति से बात करने के लिए सोंचा था वहाँ से मई घंटो निहारती कही से कोई पक्षी या परिदा दिख जाता तो मन मचल जाता मैंने तो बिना चिडियों की चहचहाहट के सवेरा देखा ही नही. सड़को पर दौड़ती कारे ऎसी लगती मनो खिलौनों का कोई शहर बसा हो .कही कोई ट्राफिक पोलिस नहीं कही कोई रोक पर सभी नियम से बंधे उसका पालन कर रहे है पर अगर कही जाना हो तो सवारी कई नही मिलेगी आपकी अपनी गाडी होना बहुत ज़रूरी है ना रिक्शा न तांगा न बस बैठे रहिये मुह उठाये . 
दिन गुज़र गए परदेस से चलने से पहले एक बार फिर इष्ट के दर्शन की इक्षा हुई शाम को हम सब मंदिर गए न जाने कैसा संयोग की शिव और उसकी पत्नी फिर मिल गए मै भला कहा चूकने वाली थीई उसके ज़ख्मो को कुरेदने से मुझे अपने घावों पर मरहम सा लगता प्रतीत होता था पूँछ ही बैठी "बेटा आज किस बात की पूजा करा रहे हो "उधर देस में हमारा फादर एक्सपायर कर गया " आवाज़ में दुःख समेट कर शिव बोला ." तुम नही गए " मै फिर बोली." उत्तर आया " उधर हमारा अंकल सब काम ख़तम कर दिया है अब हम इधर उसकी शुधि कर रहा हूँ . मुझे लगा मेरा हृदय मेरी पसलिया तोड़ कर बहार निकल आयेगा कैसे हो जाते है यहाँ पर लोग ? कुत्ते को ब्युट्टी पार्लर ले जायेगे उसकी पोट्टी उठायेगे पर अपने पिता की शुधि के लिए गोदान करने अपने देस नही जायेगे सत्य ही ये दूरिया द्रौपदी के चीर से ज़्यादा लंबी हो गयी है क्यों की कोई भी कृष्ण इसे समेटने वाला नही है.आज मै भी यहाँ से जा रही हूँ कल किसने देखा है बड़ी बेटी तो पूरी अमरीकन बन चुकी है और छोटी तो उससे भी आगे बढ़ चुकी है मेरा कल क्या होगा पता नही ........

5 comments:

Sushila Puri said...

दीदी नमस्ते
' मेरा कल ' पढ़ कर मन पसीज गया , वाकई ये बड़ी पीडा है ,पर पलायन पर रोक लगे तो कैसे लगे ? आपकी संवेदना
में मै शामिल हूँ ...........

पुरुषोत्तम कुमार said...

कई बातें मन को कचोटती हैं। आपने इतने अच्छे ढंग से लिखा है कि एक बार में पूरा पढ़ गया। काम रोक कर।

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

बहुत अच्छे ढंग से बात रखी आपने !!
जादुई प्रस्तुति !!
आभार!!


प्राइमरी का मास्टरफतेहपुर

Science Bloggers Association said...

हम अपने कल से यदि प्रेरणा ले सकें, तो यही उसकी सबसे बडी उपादेयता है।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Harkirat Haqeer said...

लाजवाब .....!! प्रीति जी जिस दर्द का आपने ब्यान किया है वो तो अपनी जगह है ही पर आपने जिस कुशलता से इस संस्मरण को शब्दों में पिरोया है कबीले tarif है .....बहुत- बहुत bdhai आपको ....!!