Tuesday, March 3, 2009

kal raat chandnii muskuraaii thii

कल रात चांदनी मुस्कुराई थी,
तारू के बीच से वो मुस्कुराई थी ,
चमका था चेहेरा बिन दांतों वाला , 
जिसने आनायास ही मेरे हृदय को मथ डाला ,
दौड़ कर भर लिया बाहों में उसको ,
लगा समा लूंगी साँसों में उसको ,
झटके से टूटी नींद टूटा वो सपना , 
खो गया वो जो थोडी देर पहले था अपना .


प्यार भरी चोट मेरी छाती पर मार के ,
दबा गया मुझे अनजाने प्यार के भार से , 
आँखे नम है , थकती नहीं उसका इंतज़ार करके , 
जो आयेगा एक दिन सात समुन्दर पार कर के. 

कान सुनेगे कब उसकी मीठी वाणी , 
तोतली भाषा में जब वो बोलेगा नानी,
अनबोली बोली से गीत वो सुनाएगा , 
और मुझे स्वर्ग का आनंद भी दिलाएगा. 

चले आओ राघव नानी रही है बुला ,
आकर मेरे कानो में अमृत की बूँद तो टपका, 
हर पल हर क्षण अब यही नाम याद आता है,
बाक़ी जीवन से अब न कोई नाता है. 

उनकी याद में जो बस गए विदेश में 
प्रीती नानी

2 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

aaj aapki saari posts padhi .. aap bahut accha likhti hai .saari posts me bhaavo ki abhivyakti bahut hi shaandar tareeke se ho rahi hai ...shabdo ka asar dil me gahre utar jaata hai..is kavita me aapne pyaar aur apnapan ke shades ko kitne asardaar tareeke se darshaya hai ...

aapko badhai ...

meri nayi poem " tera chale jaana " par apni bahumulay rai dijiyenga ..
http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html


aabhar

vijay

अनवारुल हसन [VOICE PRODUCTION] said...

इस सुन्दर कविता को पढ़ कर किसी शायर के अशआर याद आ गए ...

क्या मुझे मेरी दुआएं यहाँ ले आई हैं,
चाँद सिक्कों के लिए मैंने वतन छोडा है.
में हालत को अगर समझे तो समझे वो गज़ाल,
आबोदाना के लिए जिसने खतन छोडा है

(गज़ाल = हिरन, खतन = प्रिय भू भाग)