Tuesday, March 30, 2010

लड़की

लड़की समाज का वोह बोझ ,
जो गर्भ में ही गिरा दिया जाता है ,
अगर आ गयी संसार में ,
तो आँखों से गिरा दिया जाता है ,
छूने की कोशिश की गर आकाश को,
तो पैरो तले की ज़मीन को खींच लिया जाता ,
मै भी एक लड़की हूँ ,
छू रही हूँ आकाश,
और दबोच ली है ज़मीन अपने पाओं तले

1 comment:

हेमंत कुमार ♠ Hemant Kumar said...

मै भी एक लड़की हूँ ,
छू रही हूँ आकाश,
और दबोच ली है ज़मीन अपने पाओं तले-----------------------------------------------बहुत सुन्दर और सन्देशपरक कविता---यही जज्बा आज देश की हर स्त्री में लाने की जरूरत है।