Thursday, December 25, 2008

ज़िन्दगी पिता को समर्पित

ढाई हाँथ का कफ़न पाने के लीये इन्सां मर मर के जीता है जीने की लालसा लीये ,
सुखी हुए रोटी को लेकर के हाँथ ,
खाने की चेष्टा में खांसी के उन्माद में,
रोटी को पीस कर ईंटे गारे में लपेट कर ,
एक बार खून से उलट कर वो फिर जी उठता है जीने की लालसा लिये ।
फिसलती हुई लकड़ियों पर उसके चिपकाते हुए पाँव,
पसीने से तर बतर तार तार हुई उसकी कमीज़,
जिसने दिखाया है हमारा भविष्य और उसका अतीत,
ऐ इंसान तू क्यो इतना उंचा उठाता जाता है जहाँ से तुझे धरा का एक हिस्सा भी नज़र नही आता है,
फाड़ दे वो कमीज़ फ़ेंक दे वो बोझ , या गिरा दे ख़ुद कू उस आख़री मंजिल से नीचे ,
जहाँ पर खड़े चाँद तमाशाई तेरी मौत का तमाशा देखेते है ,
न मिला कफ़न तुझे तो क्या,
दफ़न तो युझे कोई कर ही देगा ,
ऐ इनसॉन फिर भी ,ढाई हाँथ का कफ़न पाने के लिये मर मर के जीता है जीना की लालसा लिये.

1 comment:

creativekona said...

Respected priti ji,
Hindi ke blog jagat men apka hardik svagat hai.Blog ka nam apne kafee akarshak rakha hai.Shuruat bhee apke achchhe samaya yani naye sal men ho rahee ghai.asha karta hoon ap roj achchhee rachnayen padhvatee hee rahengee.
Ap mere blog kee sadasya ban jaiye,apke blog par bhee trafik badh jayegee.Aur han apne blog men se word varieication hata den to tipiyane(tipppanee dene)men suvidha rahegee.
Naya sal apke jeevan men hajaron sooryon kee roshnee ke sath karpdon foolon kee khushboo lekar aye .is mangal kamna ke sath.
Hemant Kumar