ढाई हाँथ का कफ़न पाने के लीये इन्सां मर मर के जीता है जीने की लालसा लीये ,
सुखी हुए रोटी को लेकर के हाँथ ,
खाने की चेष्टा में खांसी के उन्माद में,
रोटी को पीस कर ईंटे गारे में लपेट कर ,
एक बार खून से उलट कर वो फिर जी उठता है जीने की लालसा लिये ।
फिसलती हुई लकड़ियों पर उसके चिपकाते हुए पाँव,
पसीने से तर बतर तार तार हुई उसकी कमीज़,
जिसने दिखाया है हमारा भविष्य और उसका अतीत,
ऐ इंसान तू क्यो इतना उंचा उठाता जाता है जहाँ से तुझे धरा का एक हिस्सा भी नज़र नही आता है,
फाड़ दे वो कमीज़ फ़ेंक दे वो बोझ , या गिरा दे ख़ुद कू उस आख़री मंजिल से नीचे ,
जहाँ पर खड़े चाँद तमाशाई तेरी मौत का तमाशा देखेते है ,
न मिला कफ़न तुझे तो क्या,
दफ़न तो युझे कोई कर ही देगा ,
ऐ इनसॉन फिर भी ,ढाई हाँथ का कफ़न पाने के लिये मर मर के जीता है जीना की लालसा लिये.
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Thursday, December 25, 2008
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